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Justice For Mahesh Kumar Verma

Justice For Mahesh Kumar Verma--------------------------------------------Alamgang PS Case No....

Posted by Justice For Mahesh Kumar Verma on Thursday, 27 August 2015
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Saturday, November 5, 2016

अपराधियों के लिए सुरक्षित स्थान : जेल

अपराधियों के लिए सुरक्षित स्थान : जेल 
इस लिंक http://www.hindi.indiasamvad.co.in/…/8-members-of-banned-si… पर सवाल उठाया गया है कि मुठभेड़ में मारे गए 8 आंतकियो के पास कहां से आए ब्रांडेड जींस टीशर्ट, मंहगी घड़ी, स्पोर्टस शूज़ ? आगे कहा गया है कि लगता है कि यह जेलखाना नहीं बल्कि आतंकियों के ऐशगाह के रूप में तब्दील थी। ..............
मैं यह स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ कि व्यावहारिक में सही में जेल के अंदर की स्थिति अपराधियों के लिए सुरक्षित स्थान रहता है जहां से वे बैठे-बैठे आसानी से जेल के बाहर अपराध कर सकते है। और अंधा कानून को कभी पता भी नहीं चलेगा कि जेल में रहकर वहाँ से अपराध किया गया है। ................ चौंकिए मत यह बात सही है। जेल के अंदर विचारधीन बंदी व सजायाफ्ता बंदी सभी के लिए वहाँ हरेक तरह के सामान उपलब्ध रहते हैं। जेल के अंदर की बात को एक पंक्ति में लोग कहते हैं कि सिर्फ कहने के लिए वह जेल है पर वहाँ लड़की छोड़कर सब कुछ उपलब्ध है। ........... मुझे यह भी कहने में कोई संकोच नहीं है कि कुछ विशेष को तो वह भी मिल जाता है। ....................
मेरी बात सुनने में अटपटा लग रहा होगा पर यह हकीकत है। वहाँ मोबाइल, बीड़ी, खैनी, सिगरेट, गाँजा ये सब तो आसानी से मिलते ही हैं। बल्कि कहिए तो जेल के अंदर इसकी दुकान रहती है। हाँ, जेल प्रशासन के कागज पर यह दुकान नहीं रहती है। पर सबको मालूम रहता है कि कहाँ किस चीज की दुकान है। .............. आपको नया मोबाइल लेना है तो नया मोबाइल मिल जाएगा। सिम कार्ड लेना है तो सिम कार्ड भी मिल जाएगा। मोबाइल से बात करने के बारे में मत पूछिए --- इस संबंध में तो फ्री होकर मोबाइल से देश दुनियाँ जहां बात करना हो कीजिये। और जिसके पास मोबाइल नहीं है वह बात कराने वाली नाजायज दुकान पर पंक्ति में लगकर बात करते हैं। ..................... गाँजा की दुकान, सिगरेट की दुकान सब दुकान है वहाँ ...................... इतना ही नहीं टीवी सेट में अपना pen drive या memory card लगाकर अपना मनचाहा फिल्म आप देख सकते हैं। अपराधी लोग हॉलीवुड फिल्म अधिक देखते हैं ताकि अपराध करने का तरीका वो आसानी से सीख सके। ................. टीवी में डिश का connection लगा रहता है। जो चैनल मन वह चैनल देखिये। ................
सरकारी जेल प्रशासन के तरफ से कागजी रूप में कैंटीन, लाइब्रेरी, जीम व गीत-संगीत की व्यवस्था भी रहती है। (पर यह सब सरकारी व्यवस्था हरेक जेल में नहीं रहती है।) पर और यदि कुछ नहीं है तो घबराने की बात नहीं है। मोबाइल है न? अपने आदमी को फोन कीजिए वह आपका सामान लेकर मुलाकाती के रूप में आपसे मिलने आ जाएगा और सामान आपको मिल जाएगा। .................. आप मांस, मछली, मिठाई, व अन्य खाने-पीने का सामान आसानी से मँगवा सकते हैं। ब्रांडेड कपड़ा, जूता-चप्पल, सब कुछ मँगवा सकते हैं। ............. हथियार ................ वहाँ, बंदी में से ही कई प्राइवेट नाई है जो वहाँ नाई का काम करते हैं और बंदी उनको पैसे देकर अपना हजामत यानि बाल, दाढ़ी, मूंछ बनवाते हैं। तो जब उन नाई बंदी के पास उस्तरा और ब्लेड आ सकता है इसके अलावा कितने बंदी अपना खाना खुद पकाते हैं और इसके लिए जब उनके पास सब्जी काटने के लिए चाकू आ सकता है। तो क्या यह हथियार आना नहीं हुआ? और जब इतना कुछ हो सकता है। तो व्यवस्था करने वाला इससे बड़ा व्यवस्था भी कर सकता है। ......................
इतना ही नहीं जेल के अंदर की दुकान में बाहर के दुकान से सस्ता में अनाज (चावल, दाल, आटा वगैरह) मिलता है और बंदी उसे खरीदकर अपने घर ले जाता है। वहाँ के अनाज के रेट सुनकर आप दंग रह जाइएगा कि इतना सस्ता? सस्ता क्यों नहीं हो? कौन वहाँ बेचने वाले को अपने घर से पूंजी लगा है? वह तो बंदी के खाने के लिए जो अनाज आता है उसे वह बेचकर अपना पैसा बना लेता है। यह काम रसोइया द्वारा किया जाता है, जो सजायाफ्ता बंदी ही रहता है। ...............
कितने सजायाफ्ता बंदी वहाँ जायज पैसा तो थोड़ा ही कमाते हैं पर नाजायज पैसा खूब कमाते हैं।
जब इतना कुछ जेल के अंदर आसानी से है तो कैसे नहीं कह सकते हैं कि जेल के अंदर ऐशो आराम के सब चीज है? हाँ, यह बात भी सही है कि जो पेशेवर अपराधी हैं या जो सजायाफ्ता बंदी हैं उन्हें सारी सुविधा आसानी से उपलब्ध रहती है। और यह बात भी है कि नए विचारधीन वैसे बंदी जो पेशे से अपराधी नहीं हैं वे इन पुराने व अपराधी बंदी के द्वारा प्रताड़ित भी होते हैं। पर जो चीज खुला दुकान में मिलता है वह सबों को उपलब्ध रहता है। नए बंदी से उसे वहाँ रहने के लिए पैसे भी लिए जाते हैं। .......................... इस प्रकार वह बंदी जो पेशेवर अपराध है उसके लिए जेल वहाँ से अपराध करने का एक सुरक्षित स्थान रहता है। और उसका सबसे बड़ा कारण है कि उसके पास मोबाइल से बात करने की पूरी छुट है। और वे मोबाइल से बात कर अपना अपराध के धंधा को वहीं से बढ़ाते रहते हैं। पर जेल से बाहर किसी भी तरह के अपराध होने पर शक के आधार पर भी पुलिस उसका नाम नहीं देगी क्योंकि वह तो जेल में बंद है। .....................
मैं बहुत लंबा लिख दिया पर आप कहेंगे कि मैं किस आधार पर जेल के अंदर इस तरह की व्यवस्था होने की पुष्टि करता हूँ? तो मैं आपको बता दूँ कि मैं एक झूठा केस में निर्दोष रहते हुये भी सात माह (210 दिन) जेल में विचारधीन बंदी के रूप में रह चुका हूँ। इन सात माह में मैं तीन जेल में रहा। जिसमें मैं एक उपकारा, एक केंद्रीय कारा (सेंट्रल जेल) व एक मंडल कारा में रहा हूँ। इन सात माह में मैंने जेल के अंदर की तमाम कुव्यवस्था देखा। जेल से आने के बाद मैं जेल के अंदर के सारे कुव्यवस्था व किस प्रकार बंदी वहाँ शोषित व प्रताड़ित होते हैं वह सब सारी बात मैं सार्वजनिक करना चाहा था। इस संबंध में मैं इस लिंक https://www.facebook.com/maheshkumar.verma2/posts/855097111243018 व इस लिंक https://www.facebook.com/maheshkumar.verma2/posts/855097221243007 पर मैं स्पष्ट लिखा था कि "210 दिन के पुलिस हिरासत व जेल से मुझे बहुत ही नुकसान हुआ है। पर जेल के अंदर किस प्रकार की अव्यवस्था रहती है, यह नजदीक से देखने का अनुभव हुआ। इस जानकारी को भी मैं सार्वजनिक करूंगा कि किस प्रकार जेल में बंदी जानवरों से भी बदतर स्थिति में रहते हैं व उनकी मौलिक अधिकार का भी हनन होता है। मैं यह भी सार्वजनिक करूंगा कि किस प्रकार जेल प्रशासन के सहयोग से ही उनलोगों के पास मोबाइल, खैनी, गाँजा व अन्य आपत्तिजनक सामान पहुँचते है। मेरे द्वारा इन बातों को सार्वजनिक करने पर यदि जेल के अंदर की स्थिति में यदि सुधार हो तो मैं समझूँगा कि मेरे जेल जाने से बाहर आने पर मैं कुछ तो जनहित में कार्य कर सका व जेल जाने का कुछ तो फायदा अन्य को हुआ। अतः आप सबों से अनुरोध है कि जेल के अंदर के स्थिति में सुधार के कार्य में आगे आयें व सहयोग करें। खासकर सामाजिक कार्य से जुड़े व्यक्ति व संस्था इस कार्य के लिए आगे आयें। आपलोगों के प्रयास से जनहित में बहुत ही बड़ा कार्य हो सकता है। अंदर की सारी स्थिति व अव्यवस्था को मैं बेहिचक सार्वजनिक करने के लिए तैयार हूँ।" ---------- ऐसा मैं उपरोक लिंक पर लिखा था। पर सारी बात सार्वजनिक करने में कोई भी मेरे साथ देने को आगे नहीं आया। पर आज "इंडिया संवाद" पर "अमित बाजपेयी" http://www.hindi.indiasamvad.co.in/Author/amit-vajpayee जी का यह आलेख "मुठभेड़ में मारे गए 8 आंतकियो के पास कहां से आए ब्रांडेड जींस टीशर्ट, मंहगी घड़ी, स्पोर्टस शूज़ ?" http://www.hindi.indiasamvad.co.in/…/8-members-of-banned-si… पढ़ने के बाद मेरी चुप्पी टूट गयी और मैं यहाँ इतना लिख दिया। अभी भी और बहुतों बात हैं जैसे आखिर किस प्रकार ये सब आपत्तिजनक सामान जेल के अंदर आता है? कहाँ व कैसे इसे छिपाकर रखा जाता है जो बाहरी पुलिस वाले भी जब छापा मारते हैं तब भी उन्हें नहीं मिलती है? ...... ऐसी बहुतों बात अभी और हैं। .............
पर मैं यह कहना चाहता हूँ कि मैं जो लिखा हूँ वह सही है और मैं यह अपने तीनों जेल में गुजारे समय के आधार पर लिखा हूँ। हाँ, मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि देश के सभी जेल ऐसे ही होंगे। पर अपने जेल में गुजारे समय के आधार पर मैं यह सही बात लिखा हूँ। यह बात मात्र सच्चाई को सार्वजनिक करने के उद्देश्य से लिखा गया है। पर मैं अनुरोध करना चाहता हूँ कि मेरे इस बात को लेकर कोई मीडिया वाले या पत्रकार या पुलिस वाले या अन्य कोई मुझे बेवजह तंग न करें पर हाँ, यदि कोई और भी गहरी सच्चाई जानने के ख्याल से मुझसे पुछना चाहें तो मैं और भी अपना सारा अनुभव व सच्चाई बता सकता हूँ। पर इसके लिए मेरे किसी भी नजदीकी या मेरे कार्य-स्थल या निवास-स्थान पर जाकर वहाँ के लोग को डिस्टर्ब न करें बल्कि जो पुछना हो मुझसे पूछें। ................
धन्यवाद।
आपका -
महेश कुमार वर्मा
10:20 Pm
05.11.2016
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https://www.facebook.com/maheshkumar.verma2/posts/1128169150602478 

Sunday, October 30, 2016

चाइनीज सामानों का बहिष्कार क्यों?

चाइनीज सामानों का बहिष्कार क्यों?

नमस्कार.
कल दिवाली का पर्व मनाया जाने वाला है. कितने लोग इस पर्व पर खासकर चाइनीज सामानों का बहिष्कार कर रहे हैं. और वे चाइनीज पटाखा व झालर न खरीदने पक्ष में हैं. वे लोग इस दिवाली के बाहर भी चाइनीज सामान न खरीदने के लिए अभियान चला रहे हैं. पर सीधी सी बात है कि चाइनीज सामान हमें सस्ता व सुलभ मिलेगा तो हम उसे क्यों नहीं खरीदेंगे? सवाल है कि आखिर लोग चाइनीज सामान का बहिष्कार क्यों कर रहे हैं? इस सवाल पर उनलोगों का तर्क यही है कि चीन पाकिस्तान का साथ देता है. ............... 
पर सच पूछिये तो आम लोग को न तो चीन से कोई दिक्कत है न तो पाकिस्तान से कोई दिक्कत है. हम आम लोगों को तो हिन्दुस्तान यानी भारत के ही हरेक विभाग व हरेक ऑफिस में बैठे भ्रष्टाचार से दिक्कत है. जिसके कारण देश के करोड़ो लोगों को उनका उचित लाभ नहीं मिल रहा है. यही वह भ्रष्टाचार है जिसके कारण आज कई लोग बेगुनाह होते हुए भी जेल में सजा काट रहे हैं. यही वह भ्रष्टाचार है जिसके कारण आज अपराधी खुला घूम रहा है और हम उन्हें कुछ नहीं कर पाते हैं और इस तरह उन्हें और भी अपराध करने में बल मिलता है. यही वह भ्रष्टाचार है जिसके कारण आज कई पीड़ितों को उचित न्याय नहीं मिलता है. और कईयों को बोलने का भी अधिकार नहीं है. यही वह भ्रष्टाचार है जिसके कारण आज कई लोग न्याय न मिलने के कारण व अपराधी के अलावा भ्रष्ट सरकारी तंत्र व भ्रष्ट कानून व्यवस्था से तंग आकर खुद अपराधी बनने के लिए विवश हो रहे हैं या मानसिक रूप से पागल हो जा रहे है या आत्महत्या कर ले रहे हैं. और जो अपराधी नहीं बना या आत्महत्या नहीं किया उसे या तो उसके विपक्षी मार दे रहे हैं या वह जीवन भर घुट-घुट कर मरने को विवश हैं. .......................... 
इन सब स्थिति के पीछे का मुख्य कारण हमारे देश में हरेक जगह फैले भ्रष्टाचार ही है. सोचें जब इस भ्रष्टाचार से इतना नुकसान है तो हम इस भ्रष्टाचार के विरोध में आगे क्यों नहीं आते हैं? सोचें कि क्या भ्रष्टाचार का विरोध न कर क्या हम इस भ्रष्ट तंत्र का समर्थन नहीं कर रहे हैं? ............... 
जब इस प्रकार हम भ्रष्टाचार का विरोध न कर भ्रष्ट तंत्र का समर्थन कर रहे हैं तो सोचें कि हम अपने देश व समाज के लिए क्या अच्छा कर रहे हैं? ................ मैं सिर्फ कहना यही चाहता हूँ कि सिर्फ यह कहकर कि चीन पाकिस्तान का समर्थन करता है, इसलिए चीनी सामानों का बहिष्कार करना है, यह किसी भी अर्थ में सही नहीं है. यह एक अंधभक्ति के अलावा कुछ भी नहीं है. .................... जी हाँ, यदि आप देशहित में या समाज हित में कुछ करना चाहते हैं तो आपको इस चीनी सामानों का बहिष्कार को छोड़कर पहले अपने ही देश में फैले भ्रष्टाचार का बहिष्कार करना चाहिए और इस भ्रष्टाचार रूपी कीड़े को समाप्त करना चाहिए. .............................. 
जी हाँ, मेरा व्यक्तिगत बात लीजियेगा तो मुझे यह कहते हुए कोई दिक्कत नहीं है कि मुझे न तो पाकिस्तान से दिक्कत है, न मुझे चीन से दिक्कत है और न मुझे चीनी सामानों से ही दिक्कत है. मुझे तो दिक्कत है अपने ही देश में फैले भ्रष्टाचार से. मुझे यह कहने में भी कोई दिक्कत नहीं है कि मैं अपने ही देश में फैले भ्रष्टाचार, अन्याय, कुव्यवस्था व भ्रष्ट तंत्र के के शिकार हूँ और मैं इस हद तक पीड़ित हो गया हूँ कि इन सबों के कारण मैं खुद मौत के निकट आते जा रहा हूँ और यह संभव है कि अब मैं मात्र कुछ ही दिनों के लिए इस दुनियाँ में रहूँ क्योंकि कब मेरे साथ क्या होगा यह मैं नहीं कह सकता हूँ. और मेरे मौत के जिम्मेवार अन्य लोग के अलावा ये सारे भ्रष्ट तंत्र व भ्रष्टाचार ही होंगे चाहे वह सरकारी हो या निजी. ............... 
मेरे साथ जो जैसा किया मैं उसे ही लेकर चलता हूँ. अतः मैं निजी रूप से न तो चीन का विरोध करता हूँ, न तो पाकिस्तान का विरोध करता हूँ और न तो मैं चीनी सामान या पाकिस्तानी सामानों का ही विरोध या बहिष्कार करता हूँ. बल्कि मैं अपने ही देश में फैले भ्रष्टाचार का विरोध करता हूँ. ....................... 
जो लोग, अंध देशभक्त होंगे उन्हें मेरा बात बुरा लग रहा होगा और वे मुझे एक देशद्रोही ही कहेंगे. जिन्हें जो कहना हो कह लें. पर यह एक कटु सच्चाई है और अंधभक्त को कटु सच्चाई चुभेगी ही. वैसे लोग मुझे अपने फ्रेंड लिस्ट से निकालना चाहें तो स्वेच्छा से निकाल सकते हैं. 
पर बुद्धिमान, विद्वान व अन्य लोगों का प्रतिक्रिया का स्वागत है. वे कृपया अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया यहाँ दें. 
आपका -
महेश कुमार वर्मा 
29.10.2016 
06:08 Pm

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Wednesday, September 30, 2015

दुष्कर्म व बलात्कार बनाम हमारा समाज

दुष्कर्म व बलात्कार बनाम हमारा समाज

आज लिंग भेद समाप्त कर महिलाओं को पुरुषों के समान दर्जा व हक दिलाने की बात कही जा रही है। भले ही कानून द्वारा महिलाओं को पुरुष के समान दर्जा मिल गया हो पर निचली स्तर पर हमारे समाज में आज भी महिलाएँ पुरुषों के अपेक्षा काफी निम्न स्तर का जीवन जी रही हैं व पुरुषों द्वारा शोषित, प्रताड़ित होने के साथ-साथ बलात्कार व दुष्कर्म का शिकार भी हो रही हैं। आखिर महिलाओं के साथ ऐसा क्यों होता है? क्या महिलाओं को सुखी पूर्वक व सम्मान के साथ जीने का हक नहीं है?
बलात्कार व दुष्कर्म के मामला को लेकर इस बात पर कई बार बहस छिड़ी है कि इन घटनाओं के लिए दोषी कौन है? सभी इस मामला में अपने-अपने ढ़ंग से तर्क देकर अपना-अपना पक्ष रखते हैं। कोई लड़की या महिला को तो कोई उनके पहनावा को तो कोई दुष्कर्मी युवक को तो कोई किसी और को दोष देता है। पर क्या हमने कभी यह सोचा है कि इन सब घटनाओं के पीछे हमारे सामाजिक व्यवस्था की कितनी दोष है? यह बात तो सही है ही कि यदि परिवार, विद्यालय व समाज द्वारा शुरू से ही सभी बच्चों (लड़का व लड़की दोनों) को सही संस्कार दिया जाए तो वे बच्चे बड़े होने पर भी संस्कारित रहेंगे व तब फिर ऐसी घटनाओं में कमी होगी। पर इसके अलावा भी हमें इस तरफ ध्यान देना चाहिए कि आज भी हमारे समाज में लड़कियों व महिलाओं को उनके मौलिक अधिकार से वंचित किया जाता है व उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता नहीं मिलती है। इस कारण भी ऐसी घटनाओं में बढ़ोत्तरीहोती है।
आज हमारे समाज में क्या होता है? लड़कियों को किसी लड़के से बात करने या मिलने पर रोक लगायी जाती है। कोई लड़की व लड़का में दोस्ती है तब भी या यों भी वे खुलकर न मिल सकते हैं, न बात कर सकते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि किसी लड़की व लड़का को बात करते कोई देख लिया तो फिर उस लड़की पर घर में व समाज में तरह-तरह के लांछन लगने शुरू हो जाते हैं व उनके साथ मारपीट भी होने लगती है। ................ आखिर ऐसा क्यों? लड़की को किसी के साथ खुलकर मिलने व बात करने का अधिकार क्यों नहीं है? क्या वह लड़की बनकर जन्म ली है सिर्फ इसीलिए? नहीं यह बात नहीं है। बात तो यह है कि यहाँ इस पुरुष प्रधान समाज में सारे नियम-कानून तो इस ढ़ंग से बने हैं कि सभी सुख-सुविधा व अधिकार पुरुष के पास हो व महिला को कोई अधिकार ही न मिले व महिला पुरुष के इशारे पर नाचे व पुरुष के लिए खिलौना बनकर रहे। .............. तब तो आज हमारे समाज में शादी के मामले में भी लड़की को अपने मन से अपने जीवनसाथी चुनने का भी अधिकार नहीं है। आज हमारे समाज में शादी में लड़की से उसके इच्छा-अनिच्छा के बारे में भी नहीं पूछा जाता है। बल्कि माँ-बाप अपने मन से किसी लड़के से उसकी शादी करा देते हैं। यदि लड़की उनके फैसले के विरुद्ध कुछ कह भी दे तो उसपर विचार नहीं होता है बल्कि उस लड़की को और भी खरी-खोटी सुननी पड़ती है। इस प्रकार लड़की अपनी जीवनसाथी के चुनाव में भी अपना विचार नहीं दे सकती है। और इस प्रकार माँ-बाप द्वारा लड़की की जो शादी करायी जाती है वह जबरन करायी गयी शादी ही होती है, जिसे जिंदगी भर लड़की को झेलना पड़ता है।
आखिर लड़की को अपने जीवनसाथी चुनने का अधिकार क्यों नहीं है? लड़की को किसी से स्वतंत्र रूप से मिलने और बात करने का अधिकार क्यों नहीं है? हमारे समाज की यह व्यवस्था सुव्यवस्था नहीं बल्कि एक कुव्यवस्था है। और इसी के परिणामस्वरूप यह होता है कि कोई लड़की-लड़का सामान्य रूप में भी यदि आपस में मिलते हैं या बात करते हैं तो वे अपने माँ-बाप या अभिभावक के नजरों से छिपकर मिलते हैं ताकि कोई उन्हें देखे न। और इसी तरह यदि किसी लड़की-लड़का में प्रेम हो जाता है तो वे हमेशा लोगों से नजरें चुराकर छिपकर मिलने लगते हैं। ............... यदि हमारे समाज में लड़का-लड़की के मिलने पर रोक न हो व लड़का-लड़की सभी को अपने जीवनसाथी चुनने का पूर्ण अधिकार हो तब फिर ये लोग इस प्रकार छिपकर कभी नहीं मिलेंगे। पर हमारे समाज में ऐसी स्वतंत्रता नहीं है। जिस कारण ये लोग छिपकर मिलते हैं। पर इस प्रकार छिपकर मिलने में हमेशा उन्हें पकड़े जाने या मार खाने का डर भी बना रहता है। साथ ही इस प्रकार छिपकर मिलने में उन्हें न तो मिलने की संतुष्टि पूरी होती है और न तो बात करने की ही संतुष्टि पूरी होती है। बाद में उनकी स्थिति ऐसी हो जाती है की वे न तो घर-समाज से भागकर शादी ही कर पाते हैं न तो अपने प्रेम-प्रसंग की बात घर-समाज में कह ही पाते हैं। कितने भागकर शादी कर भी लेते है पर फिर भी यदि वे पकड़े जाते हैं तो उन्हें घर-समाज से डांट-डपट सुननी पड़ती है या फिर उन्हें समाज में रहने के लिए जगह भी नहीं मिलती है। आखिर ऐसा क्यों? लड़का हो या लड़की, क्यों नहीं सभी को स्वतंत्र रूप से जीने, लोगों से मिलने, बात करने व अपने जीवनसाथी चुनने का अधिकार है? हमारे समाज के इसी कुव्यवस्था का एक दुष्परिणाम यह भी है की इसी कुव्यवस्था में कुछ लड़के या युवक ऐसे हो जाते हैं जो अपने विपरीत लिंगी साथी से खुलकर न मिलने या न बात करने या हमेशा किसी भी विपरीत लिंगी से बात करने या मिलने में बाधा के कारण अपना मानसिक संतुलन इस हद तक खो देते हैं कि फिर उसका स्वभाव कामुकता हो जाती है और फिर वे किसी भी लड़की या महिला के साथ बलात्कार या दुष्कर्म की घटना को अंजाम दे देते हैं। वहीं इसी तरह मानसिक संतुलन खोने की स्थिति में कुछ युवक ऐसे हो जाते हैं जो झूठा प्यार का नाटक कर लड़कियों को फँसाना शुरू कर देते हैं। और इस तरह के झूठा प्यार में फँसे लड़कियों के साथ आगे धोखा ही होता है। ...................
इस प्रकार हमारे समाज में लड़की-लड़का को आपस में मिलने-जुलने या बात करने पर जो रोक लगी हुयी है तथा उन्हें स्वतंत्र रूप से जीने व अपना जीवनसाथी चुनने का जो अधिकार प्राप्त नहीं है उस कारण ही दुष्कर्म व बलात्कार की घटनाएँ बढ़ रही हैं। यदि हमारे समाज में लड़की-लड़का सबों को स्वतंत्र रूप से जीने, आपस में खुलकर किसी से भी मिलने, बात करने व अपना जीवनसाथी खुद चुनने का पूर्ण अधिकार मिल जाए तो निश्चित रूप से दुष्कर्म व बलात्कार जैसी घटनाओं में कमी आएगी।

-    महेश कुमार वर्मा
16.09.2015
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(इस आलेख में उल्लेखित विचार लेखक के निजी विचार हैं।)


Saturday, September 26, 2015

बुरा वक्त का अच्छा संदेश

बुरा वक्त का अच्छा संदेश 

वक्त पर होती है पहचान 
कि दोस्त कैसा है 
वक्त पर पर होती है पहचान 
कि कौन कैसा है 
वक्त पर होती है पहचान दोस्त की 
वक्त पर होती है पहचान अपनों की 
यदि बुरा वक्त न आए 
तो न होगी इनकी सही पहचान 
बुरा वक्त में ही होती है 
इनकी सही पहचान 
अतः बुरे वक्त को 
ईश्वर के द्वारा दिया गया 
वह अच्छा समय समझो 
जिसमें होती है 
लोगों की असलियत की पहचान 
जिसमें होती है 
अपनों व परायों की पहचान 
जिसमें होती है 
दोस्त व दुश्मन की पहचान 
अतः वह बुरा वक्त भी धन्य है 
जिसने करायी मुझे इस वास्तविकता की पहचान 
पर हे प्रभु 
कितना अच्छा होता 
जब बिना बुरा वक्त दिखाये 
तुम इस वास्तविकता की पहचान करा दिया होता 
तो मुझे न इतना कष्ट होता 
और न कोई काम में विध्न होता 
अतः हे प्रभु 
ऐसा बुरा वक्त फिर न दिखाना 
व वास्तविकता की पहचान पहले करा देना


-- महेश कुमार वर्मा 
01.03.2015

Tuesday, November 11, 2014

क्या मेला के आयोजक आय व व्यय के डिटेल्स सार्वजनिक कर सकते हैं?

क्या मेला के आयोजक आय व व्यय के डिटेल्स सार्वजनिक कर सकते हैं?

कल मैं पटना पुस्तक मेला 2014 के व्यवस्था पर जो सवाल उठाया था उसे आज दैनिक भास्कर के DB स्टार के पृष्ट 2 पर प्रकाशित किया गया है. मामला को समाचार पत्र में स्थान देने के लिये दैनिक भास्कर परिवार को धन्यवाद. 
http://epaper.bhaskar.com/detail/?id=8855&boxid=111114024621&ch=bihar&map=map&currentTab=tabs-1&pagedate=11%2F11%2F2014&editioncode=385&pageno=2&view=image 


DB स्टार में प्रकाशित खबर के अनुसार मेला के व्यवस्था पर मेला के आयोजन समिति के रत्नेश्वर जी कहे कि अपनी तरफ से हम कोई कमी नहीं छोड़े हैं पर इतनी संख्या में लोग आते हैं अतः संभव है कि एक-दो की उम्मीदों पर हम खरे नहीं उतरे.

रत्नेश्वर जी का यह बयान पूर्णतः टाल-मटोल वाला बयान है. मैं आयोजन समिति से जानना चाहता हूँ कि वे आम लोगों के लिये आखिर किस सुविधा की व्यवस्था किये हैं? स्टाल वालों से व आगंतुक से इतनी अधिक मात्रा में पैसे लिये जाने के बाद भी तो आपने कोई व्यवस्था नहीं किया है, सिवाय पार्टीशन कर स्टाल वाले को अपने किताब रखने के लिये जगह देने के. आप खुद अपनी कमी को देखें.
  1. टिकट काउंटर पर काउंटर नंबर नहीं है जिससे कि किसी भी प्रकार के दिक्कत होने पर सही काउंटर की जानकारी देते हुये कोई सूचना या शिकायत उचित स्थानों तक पहुंचाया जा सके.
  2. इसी तरह पुस्तकों के स्टालों पर भी स्टाल नंबर नहीं लिखा गया जिससे कि लोग किसी खास स्टाल को आसानी से पहचान सके या वहाँ दुबारा आसानी से पहुँच सके.
  3. मेला कैंपस के बाहर व भीतर मुख्य प्रवेश द्वार के नजदीक सभी स्टालों के आयोजकों के नाम उनके स्टाल नंबर सहित एक बड़ी बोर्ड में लिखा रहना चाहिये था. ताकि लोग किसी खाश प्रकाशक के बारे में यह जान सके कि उनका स्टाल लगा है या नहीं और है तो वह कहाँ पर है. पर आपने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं किया.
  4. आपको किसी भी प्रकार के समस्या / सहायता / शिकायत दर्ज करने के लिये एक हेल्प लाइन नंबर की व्यवस्था करना चाहिये था. और इस नंबर को प्रवेश द्वार के बाहर व भीतर प्रवेश द्वार के नजदीक व अन्य जगहों पर भी स्पष्ट रूप से बैनर लगाकर या अन्य उचित तरीका से डिस्प्ले कराना चाहिये था. साथ ही इसके लिये आपका एक स्टाल मुख्य प्रवेश द्वार के नजदीक रहना भी चाहिये ताकि जरुरत पड़ने पर लोग उनसे कुछ पूछ सके या कोई सहायता ले सके. पर आपने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं किया.
  5. आप मेला में तो कुछ बैंक का स्टाल लगवा दिये पर किसी भी बैंक का एक भी एटीएम नहीं लगवाये. एटीएम मेला के लिये एक महत्वपूर्ण सुविधा है ताकि लोगों के पॉकेट के पैसा समाप्त हो जाने पर भी वे एटीएम से पैसा निकाल कर अपनी खरीददारी जारी रख सके.
  6. आप यह तो महसूस किये कि आने वाले लोगों के पेशाब-पैखाना के लिये मूत्रालय व सौचालय होना चाहिये और आप ऐसा व्यवस्था किये भी. पर आप यह महसूस नहीं किये कि पेशाब-पैखाना के बाद अंग धोने के लिये पानी की व्यवस्था भी होनी चाहिये. इसी तरह आपने पीने के लिये भी पानी की व्यवस्था नहीं किये. यहाँ तक कि जहाँ खाने-पीने / नास्ता / खाना का स्टाल है उसके नजदीक भी आपने पानी की व्यवस्था नहीं किये. पुरे मेला में कहीं भी पानी की व्यवस्था नहीं है, सिवाय स्टाल से पैसे पानी के बोतल बिक्री का. क्या आपकी सोच में पानी का कोई महत्व नहीं है?
  7. आप स्टाल वालों से प्रति स्टाल दस हजार रुपये से ढाई लाख रुपये तक लिये पर उनकी पुस्तकों की सुरक्षा के लिये आपने कोई व्यवस्था नहीं किया. यहाँ तक कि बाहर निकलने वाले लोगों के साथ के किताब और बिल को भी नहीं चेक किया जा रहा है. यदि आप यहाँ कहेंगे कि स्टाल वालों को खुद अपनी पुस्तक की सुरक्षा करनी है कि कोई किताब चुराकर नहीं ले जाये. तब मैं आपने पूछना चाहता हूँ कि तो आप प्रति स्टाल दस हजार रुपये से ढाई लाख रुपये तक किस कार्य के लिये लिये? क्या यह रकम सिर्फ एक पार्टीशन कर किताब रखने की जगह भर देने लिये लिया गया है?
  8. आप आने वाले पुस्तक प्रेमी / आगंतुक से प्रवेश शुल्क के रूप में 5 रुपये ले रहे हैं. साथ ही आगंतुक के साइकिल या वाहन लगाने ले किये पार्किंग चार्ज भी अलग से ले रहे हैं. आखिर पार्किंग चार्ज व प्रवेश शुल्क के रूप में पैसे लेने की क्या जरुरत हैं? स्टाल वालों से प्रति स्टाल दस हजार से ढाई लाख रुपये तक जो लिये गये हैं, क्या वह इतनी पर्याप्त रकम नहीं है कि प्रवेश व पार्किंग निःशुल्क किया जा सके. सीधी सी बात है कि यदि आप स्टाल वाले से इतनी बड़ी रकम लिये हैं तो आपको प्रवेश व पार्किंग निःशुल्क रखना चाहिये. और यदि आप प्रवेश व पार्किंग के लिये पैसे लेते हैं तो आपको स्टाल वालों से पैसा नहीं लेना चाहिये.
  9. किसी भी प्रकार के अनहोनी या अपराध होने की स्थिति में सुरक्षा व्यवस्था के लिये या इससे निबटने के लिये आपने कोई पुलिसकर्मी को तैनात नहीं करवाया.
  10. अगजनी जैसी घटनाओं से तत्काल निबटने के लिये आपने वहाँ नजदीक में कोई दमकल की व्यवस्था भी नहीं किये.
  11. आपको आकस्मिक स्थिति से निबटने के लिये वहाँ First Aid की व्यवस्था भी करनी चाहिये थी पर आपने यह भी नहीं किया.

इस प्रकार आपने स्टाल वालों से व आने वाले आगंतुक से बहुत ही भारी मात्रा में पैसा वसूल करने के बाद भी किसी भी तरह की मूलभूत सुविधा की व्यवस्था नहीं किया. क्या आप मेला के आय व व्यय का पूर्ण डिटेल्स सार्वजनिक कर सकते हैं ताकि स्टाल वाले व आम लोग यह जान सके कि उनके पैसे का कितना सदुपयोग हुआ है?

-- महेश कुमार वर्मा 
(स्वतंत्र लेखक)

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http://popularindia.blogspot.in/2014/11/21-2014.html 

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Monday, November 10, 2014

21वीं पटना पुस्तक मेला 2014 : व्यवस्था या व्यवस्था के नाम पर ठगी

21वीं पटना पुस्तक मेला 2014 : व्यवस्था या व्यवस्था के नाम पर ठगी 

पटना के गांधी मैदान में CRD (Centre For Readership Development) (http://www.crdindia.org/) के तरफ से 21वीं पुस्तक मेला का आयोजन किया गया है जो 07.11.2014 से 18.11.2014 तक है. कल 09.11.2014 को मैं भी पुस्तक मेला घुमने गया. पर मेला में प्रवेश से पहले से ही असुविधा नजर आने लगी. मेला में लगे स्टाल वालों से प्रति स्टाल रु. 10,337 से रु. 2,49,439 तक लिया गया है. उसके अलावा मेला में आने वाले लोगों से प्रति व्यक्ति रु. 5 का टिकट लिया जाता है और साथ ही आगंतुक यदि अपने साथ कोई वाहन (साईकिल / मोटर साईकिल / कार) से आते हैं तो इसका पार्किंग चार्ज अलग से लिया जा रहा है. आयोजक द्वारा इतने बड़ी रकम स्टाल वालों से व आगंतुक से लिये जाने के बावजूद मैं वहाँ कोई खास व्यवस्था नहीं देखा. देखने से यही प्रतीत होता है कि सुविधा के नाम पर इतना पैसा लेकर सुविधा न देकर सिर्फ पैसा ठगा गया है. आप जानना चाहेंगे कि आखिर मैं वहाँ ऐसी क्या कमी देखा जो मैं इस तरह लिख रहा हूँ. कमी एक-दो नहीं बल्कि कई कमियाँ थी. आगे मैं उन कमियों व कुव्यवस्था का वर्णन कर रहा हूँ: 
  1. टिकट लेकर अन्दर जाने से पहले ही मुझे अव्यस्था नजर आने लगी. हुआ यह कि जब मैं एक टिकट काउंटर पर टिकट लेने गया तो देखा कि वहाँ 2 विद्यार्थी अपने एक सौ रुपये का नोट प्राप्त करने के लिये परेशान थे जो टिकट काउंटर में अन्दर से गिर गया था. काउंटर पर बैठे महिला क्लर्क से जब मैं पूछा तो वह बतायी कि नोट बाहर जो दिवार खड़ा किया गया है और उस क्लर्क के डेस्क के बीच के जगह में गिर गया है जो अब इसके हटने पर ही मिल सकता है. उनके अनुसार वह दिवार व डेस्क वहाँ जाम किया हुआ है और उसके बिना हटे नोट तक नहीं पहुँचा जा सकता है. ................... यदि उस महिला क्लर्क के द्वारा बतायी गयी यह बात सही है तो सवाल उठता है कि उस दिवार व डेस्क के बीच में खाली जगह क्यों छोड़ा गया जो वहाँ नोट गिर गया. ........... फिर यदि नोट वहाँ गिर ही गया तो वह महिला क्लर्क उस विद्यार्थी को नोट प्राप्त कराने के लिये मेला प्रशासन को खबर करके उसे नोट वापस दिलाने में मदद क्यों नहीं कर रही थी? ......................... आखिर वह महिला क्लर्क उन विद्यार्थी की कोई सहायता नहीं की. वे विद्यार्थी बाहर से दिवार निचे से तोड़कर नोट निकालना चाह रहे थे. फिर मैं उन विद्यार्थी को सलाह दिया कि एक टिकट लेकर अंदर चले जाइए और अन्दर में मेला का ऑफिस होगा वहाँ जानकारी दे दीजिये तब वे अपने व्यक्ति से नोट निकलवाने का कोशिश कर सकते हैं, खुद मत तोड़िए. फिर मैं अपना टिकट लेकर मेला के अंदर गया. बाद में वे विद्यार्थी अपनी समस्या मेला प्रशासन को दिये या नहीं यह मुझे नहीं मालुम. 
  2. मेला में स्टाल के प्रवेश द्वार पर स्टाल नंबर स्पष्ट रूप से लिखा जाना चाहिए था, जो नहीं था. स्टाल नंबर लिखे जाने से लोगों को ख़ास स्टाल को पहचानने में या पुनः उस स्टाल पर आने में सहूलियत होती. 
  3. मेला में किसी भी बैंक का कम-से-कम एक अस्थायी या मोबाइल एटीएम रहना चाहिए था ताकि लोगों के पॉकेट का नकदी समाप्त हो जाने पर वे एटीएम से पैसा निकाल कर अपनी खरीददारी जारी रख सके. पर ऐसा कोई एटीएम वहाँ नहीं था. जिस कारण लोगों को परेशानी संभव है. खुद मेरे पॉकेट का नकदी समाप्त हो जाने पर मुझे चुने हुये कुछ पुस्तकें वापस करने पड़े. 
  4. मेला के बाहर या अंदर कोई भी पुलिसकर्मी नहीं था. यह प्रशासन की बहुत ही बड़ी चुक थी. कुछ ही माह पहले उसी गांधी मैदान में रावण-दहन के कार्यक्रम में भगदड़ से कम-से-कम 33 लोगों की जान गयी थी और इसमें पुलिस प्रशासन की बहुत ही बड़ी लापरवाही सामने आयी थी. पर पुलिस प्रशासन या जिला प्रशासन इससे सबक नहीं ली और इस पुस्तक मेला में पुलिस की कोई व्यवस्था ही नहीं थी. 
  5. अगजनी जैसी घटनाओं से निपटने के लिये वहाँ कोई दमकल नहीं था. मेला के अंदर कुछ जगह आग बुझाने वाला मशीन (जो ऑफिस वगैरह में रहता है) देखा जरुर पर वह मेला के तरफ से था या स्टाल का अपना था यह मैं नहीं कह सकता हूँ. 
  6. मेला के अंदर पेशाब-पैखाना के लिये मूत्रालय व सौचालय तो था पर पुरे मेला में पानी की व्यवस्था कहीं भी नहीं था. स्थिति यह था कि जहां खाने-पीने का स्टाल लगा था वहाँ भी पानी की व्यवस्था नहीं था. स्थिति यह थी कि यदि आपको पीने के लिये या कोई अन्य काम के लिये पानी की जरुरत है तो आपको वहाँ के खाने-पीने के स्टाल से पैसे देकर बोतल वाला पानी खरीदना पड़ेगा. .................. मेला में निःशुल्क पीने का पानी की व्यवस्था होनी चाहिये. इसके लिये चापाकल लगाया जा सकता था. 
  7. मेला में अनाउंसमेंट कर यह प्रचार तो किया जा रहा था कि कोई भी पुस्तक खरीदने पर बिल जरुर ले लें. साथ ही गेट पर के कर्मचारियों को अनाउंसमेंट कर कहा जा रहा था कि बिना बिल के कोई किताब को बाहर न जाने दिया जाये. पर वहाँ इस तरह की कोई चेकिंग नहीं हो रही थी जिससे कि यह पता चले कि लोग जो किताब बाहर ले जा रहे हैं वह खरीदकर ले जा रहे हैं या चुराकर. बाहर निकलते समय वहाँ के कर्मचारी सिर्फ बिल पर (बिने देखे, बिना पढ़े, बिना मिलाये) एक मुहर लगा दे रहे थे. ऐसी स्थिति में कोई भी कितनी भी मात्रा में किताब चुराकर बाहर ले जाये तो वहाँ के कर्मचारी या प्रशासन को पता तक नहीं चलेगा.
  8. इन सबों के अलावा मैं वहाँ पर एक और बहुत बड़ी अनियमितता देखा. वह यह है कि मैं जब राजा पॉकेट बुक्स के स्टाल पर पुस्तकें देख रहा था तो वहाँ एक थैला (पोलीथिन) में एक पुस्तक देखा जिसके साथ पुस्तक का बिल भी था, जो कि शायद किसी का छुट गया था. वहाँ मेरे नजदीक में जो दो व्यक्ति थे उनसे मैं इस संबंध में पूछा तो वे बताये कि उनका नहीं है. फिर मैं सोचा कि कोई किताब खरीदा है और उसका छुट गया है सो इसे सही व्यक्ति तक पहुँचाने की कोशिश करनी चाहिये. यह बात सोचकर मैं उस स्टाल के बिल काटने वाले को इस बात की जानकारी दी तो वे अपने एक स्टाफ को यह कहते हुये वह किताब लाने को कहा कि इसका अनाउंसमेंट करवा देंगे. फिर मैं उस स्टाफ को वह पुस्तक का थैला (पोलीथिन) दिखाया, जिसे वह लाकर उसी बिल काटने वाले को जो उसे पुस्तक लाने को कहा था, दे दिया. उस वक्त मैं फिर उस बिल काटने वाले से कहा कि इसका अनाउंसमेंट करवाकर जिसका है सही व्यक्ति को दिलवा दीजिये. इसपर वे किताब वहाँ रख लिये और कहे कि अभी अनाउंसमेंट करवाने का समय नहीं है. .............. फिर मैं उस स्टाल से निकल गया और शेष मेला घुमा. पर बाद में भी मैं इस घटना पर सोचा कि जिसका भी पुस्तक है वह पैसा देकर खरीदा है और वह छुट गया है अतः वह पुस्तक सही व्यक्ति तक पहुँच जाये. मुझे लग रहा था कि वह स्टाल वाला अनाउंसमेंट नहीं कराएगा. अतः मैं खुद इस घटना के बारे में मेला प्रशासन को सूचित करने को सोचा. और फिर मैं मेला प्रशासन के ऑफिस पर गया. वहाँ बाहर खड़े गार्ड मुझसे काम पूछने लगे तो मैं बताया कि ऑफिस के किसी व्यक्ति से मिलवाइये. इसपर वे काम का डिटेल्स पूछने लगे. मैं उसे काम बताना चाहा पर फिर मैं पूछा कि काम आप ही सुनियेगा या किसी से भेंट कराईयेगा. इस पर वह गार्ड बोला कि काम बताइये न. तब मैं उसे काम बताने ही वाला था कि अंदर से मेला के Convenor अमित झा अंदर से बाहर आये. मैं उनसे पहले से मिला हुआ था अतः मैं उन्हें पहचान गया वे भी मुझे पहचान गये. फिर मैं गार्ड के पास से हटकर उनके साथ ही बाहर आ गया. मैं उन्हें राजा पॉकेट बुक्स में किताब मिलने वाली उपरोक्त घटना बताते हुये बताया कि वह किताब रख लिया है और कहा कि अनाउंसमेंट कराने का समय नहीं है. इसपर अमित जी भी बोले कि ठीक ही कहा अभी किसको समय है. आगे वे बोले कि जिसका किताब है वह खुद मेरे पास अनाउंसमेंट करवाने आयेगा. तब मैं अमित जी को कहा कि लेकिन किताब मिल गया है. अमित जी बोले हाँ यही राज पॉकेट न (उस समय हमलोग राजा पॉकेट बुक्स के स्टाल के सामने से ही गुजर रहे थे)? ............ अमित जी कोई कारवाई नहीं किये और आगे बढ़ गये, फिर मैं भी उनका साथ छोड़ दिया. ................... क्या मेला प्रशासन / अमित जी / राजा पॉकेट बुक्स वाले का यह कार्रवाई / व्यवहार सही था? क्या राजा पॉकेट वाले को वह किताब मेला ऑफिस में जमा करवाकर अनाउंसमेंट नहीं करवाना चाहिये था? क्या अमित जी को जानकारी मिलने पर राजा पॉकेट के स्टाल से वह किताब उठवा कर मेला ऑफिस में जमा कर अनाउंसमेंट करवाने का फर्ज नहीं था? ........................... बाद में मैं सोच रहा था कि मैं राजा पॉकेट वाले को क्यों यह बताया, खुद वह किताब ले जाकर मेला ऑफिस में जमा कर अनाउंसमेंट करवा देता. ............... फिर बाद में मैं मेला से बाहर आ गया. ................ पता नहीं उस किताब के बारे में अब तक कोई अनाउंसमेंट हुआ या नहीं और सही व्यक्ति को वह मिला या नहीं? बाद में या आज यदि अनाउंसमेंट हुआ भी होगा तो अब शायद सही व्यक्ति तक उस किताब का पहुँच पाना मुश्किल है क्योंकि सामान्यतः कोई एक बार ही मेला जाता है. वह व्यकित (जिसका वह किताब था) कल मेला गया था तो फिर आज नहीं गया होगा. यदि कल उसी समय अनाउंसमेंट किया जाता तो शायद उस व्यक्ति को उसकी खोयी किताब मिल जाती. ................. पर शायद वहाँ सभी सिर्फ अपने फायदे के लिये ही थे. किसी के नुकसान पर सोचने वाला कोई नहीं था. 
तो यह थी पुस्तक मेला की अव्यवस्था की कहानी. मेला में लगे स्टाल वालों से प्रति स्टाल रु. 10,337 से रु. 2,49,439 तक लिया गया है. उसके अलावा मेला में आने वाले लोगों से प्रति व्यक्ति रु. 5 का टिकट लिया जाता है और साथ ही आगंतुक यदि अपने साथ कोई वाहन (साईकिल / मोटर साईकिल / कार) से आते हैं तो इसका पार्किंग चार्ज अलग से लिया जा रहा है. आयोजक द्वारा इतने बड़ी रकम स्टाल वालों से व आगंतुक से लिये जाने के बावजूद मैं वहाँ कोई खास व्यवस्था नहीं होने के पीछे की सच्चाई क्या है? क्या पुस्तक मेला में व्यवस्था के नाम पर स्टाल वालों से व आगंतुक से जो इतनी ज्यादा मात्रा में पैसे लिये गये व लिये जा रहे हैं वह सिर्फ अपने पॉकेट गरम करने के लिये? क्या उनका यह कर्तव्य नहीं है कि वे आम लोग व आगंतुक के सुविधा के लिये भी सोचे? क्या आयोजक को ऐसी व्यवस्था करने का कर्तव्य नहीं है कि आगंतुक का नुकसान न हो और यदि नुकसान हो गया तो यथासंभव उस नुकसान की पूर्ति के लिये कम-से-कम मानवीय कर्तव्य भी निभाया जाये? 


-- महेश कुमार वर्मा 
(स्वतंत्र लेखक)

Thursday, March 6, 2014

मीना व उसकी माँ

मीना व उसकी माँ


दिवाली के दिन शाम से ही बंटी अपने दोस्तों के साथ पटाखे छोड़ने मौज मनाने में लगा थाघर में माँ बेटी मीना के साथ मेहमानों के आवभगत में लगी थीजो भी दीपावली की शुभकामना देने मिलने आते थे उन्हें घर में बने पकवान थोड़ा सा मिठाई से मुँह मीठा कराया जाता था

काफी देर तक मेहमानों का आना होते रहामेहमानों के आवभगत के बाद मीना माँ से कही - "मैं भी जाती हूँ खाने।"

"जाओ खा लो।"

माँ के इतना कहने पर मीना खाने चली गयीपर माँ ने फिर पीछे से आवाज लगाई - "मीना बिटिया"

"हाँ मम्मी"

"सुबह का चावल पड़ा होगा, वह भी खा लेना।"

"पर माँ वह चावल तो बासी हो गया, क्या मैं पकवान नहीं खाऊँ?

"चावल बरबाद हो जाएगा उसे खा ले, पकवान कल खा लेना।"

"नहीं खाऊँगी मैं।" -- इतना कहकर मीना क्रूध  उदास मन से अपने बिछावन पर चली गयीहमेशा ही मीना को बचा हुआ भोजन खाना पड़ता था

काफी देर तक मीना जब खाने के लिए नहीं गयी तब माँ गुस्सा में आवाज लगाते हुए नजदीक गयी -- "मीना, भोजन की, जाओ भोजन कर लो।"

मीना - "मैं चावल नहीं खाऊँगी।"

"क्यों?"

"वह बासी हो गयी। मेरे टीचर कहते हैं कि बासी भोजन मत करो खुले बाजार का सामान जिसपर धुल मक्खी बैठती है उसे मत खाओ।"

माँ का गुस्सा बढ़ गया, वह गुस्साते हुए बोली - "चलो खाएगी या नहीं?" माँ मीना का हाथ पकड़कर खींचकर बिछावन से नीचे कर दी। 

मीना माँ के मार के डर से भोजन करने चली गयीमाँ अपने ही आप कहने लगी - 'स्कूल क्या भेजने लगी कि मुझे ही पढ़ाने लगी हैइससे अच्छा तो नहीं पढाती।' वहीँ कोने में बैठी बूढी दादी बड़बड़ायी - "आजकल तो बेटी पैदा करना ही पाप है।"


मीना थोड़ी सी सुबह वाला चावल खाकर सोने चली गयीइधर बंटी आया तो वह पुनः पकवान मिठाई खायामीना हमेशा घर में अपने बंटी में भेदभाव देखती थी। उस दिन का यह घटना उसके मन में बैठ गयी और वह सोचने लगी कि रोज-रोज बचा भात मैं ही क्यों खाऊँ, बंटी भैया क्यों नहीं खायेगा?' ......... आज की मिठाई मीना अभी तक नहीं खाई थी, इस कारण उसे नींद नहीं रही थी और काफी देर तक वह बिछावन पर जगी रही। फिर जाने कब उसे नींद गयी


कुछ ही दिनों के बाद माँ छठ पर्व की तैयारी में कार्य में व्यस्त थीमाँ को बेटी मीना से कार्य में काफी सहायता मिल रही थीजहाँ मीना माँ को कार्य में सहायता करती वहीँ बंटी को यदि माँ कोई कार्य के लिए कहती तो वह टाल देता कार्य नहीं करता। .......... अब वह माँ यह महसुश कर चुकी थी मीना बिटिया से उसे काफी सहायता मिली मीना की सहायता से ही वह इतनी व्यवस्था कर सकी है


अब माँ यह अच्छी तरह समझ चुकी थी कि बेटा बेटी दोनों को अलग-अलग नहीं बल्कि एक ही दृष्टि से देखनी चाहिएअब माँ का मीना के प्रति व्यव्हार बदल गया था। अब वह बंटी मीना दोनों को समान रूप से देखती थी अब उसकी यही ख्वाहिश थी कि दोनों पढ़-लिख कर आगे बढ़े


लेखक -- महेश कुमार वर्मा 


Tuesday, March 4, 2014

नेता

नेता
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थे कभी गरीब इंसान।
नेता बने हुये धनवान॥
छोटा सा घर महल में बदला।
घुमने के लिए कार आया॥
भूल गए जन हित की बातें।
पर अवैध वसूली कभी न भूलते॥
क्षेत्र विकास के पैसे अपने घर में हैं लगाते।
गरीब जनता को और भी अधिक हैं सताते॥
बने हैं नेता जबसे।
पैसे ही पहचानते तबसे॥
नहीं पहचानते और किसी को।
छोड़ राजनीति कुछ न आता उनको॥
थे कभी गरीब इंसान।
आज है उनकी अलग पहचान॥
नेता बने हुये धनवान।
नेता बने हुये धनवान॥
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Saturday, November 2, 2013

दीपावली की शुभकामना

दीपावली की शुभकामना 

सबों को दीपावली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ


Friday, August 23, 2013

बलात्कार या अन्य अपराध पर सजा पर मेरा निजी विचार

बलात्कार या अन्य अपराध पर सजा पर मेरा निजी विचार

31.12.2012  को मैं justice.verma@nic.in को मैं बलात्कार या अन्य अपराध पर सजा पर अपना निजी विचार e-mail से लिखा था उसे मैं यहाँ हुबहू दे रहा हूँ. पाठक अपना विचार दें. 
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MAHESH KUMAR Verma 31 December 2012 11:13
To: justice.verma@nic.in
महेश कुमार वर्मा
Webpage : http://popularindia.blogspot.in
E-mail ID : vermamahesh7@gmail.com
Contact No. : +919955239846
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महाशय,
सरकार बलात्कारियों की सजा के संदर्भ में आम लोगों की से राय माँगी  है। इसी संदर्भ में यह ई-मेल किया जा रहा है जिसमें मेरा निजी विचार दिया जा रहा है।  --

बलात्कारियों की सजा क्या होनी चाहिए इस बात पर चर्चा करने से पहले मैं इस बात पर चर्चा करना चाहूँगा कि बलात्कार या कोई भी अपराध के लिए अपराधी को सजा देने का क्या उद्देश्य होना चाहिए? निश्चित रूप से सजा का उद्देश्य यही होना चाहिए कि वह अपराधी या अन्य भी पुनः भविष्य में वैसी अपराध करने का दुस्साहस न करे। और इस प्रकार अपराधी को सजा देकर अपराध मुक्त समाज की स्थापना करना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए। और इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही सजा तय की जानी  चाहिए। इस बात पर विचार करने पर हम पाते हैं कि किसी भी अपराध के लिए सजा ऐसा नहीं होना चाहिए की अपराधी को सजा के दौरान कुछ समय के लिए कष्ट तो हो पर फिर सजा के बाद उसमें सुधार नहीं पाया जाए तथा सजा ऐसी भी नहीं होनी चाहिए की सजा का असर सिर्फ उस अपराधी पर ही पड़े तथा अन्य उस सजा से सबक न ले व अपने में सुधार न करे। अर्थात सजा वैसी होनी चाहिए कि उस सजा के बाद अपराधी में सुधार हो और वह पुनः वैसा अपराध न करे तथा सजा से अन्य भी सबक ले व फिर कोई वैसा अपराध करने का दुस्साहस न करे। यानि सजा का उद्देश्य सिर्फ अपराधी को कष्ट देना ही नहीं बल्कि अपराधी व समाज में सुधार लाना होना चाहिए।

इन सब बातों पर विचार करने पर हम पाते हैं कि पैसे वाले अपराधी के लिए आर्थिक दंड की सजा का कोई मतलब नहीं रह जाता है उसी तरह अपराध के लिए जान दाव पर लगाने वाले या मानव बम बनने वाले अपराधी के लिए वर्तमान तरीके से दी जाने वाली मौत की सजा (समाज से दूर अकेले में फाँसी देना) का कोई मतलब नहीं रह जाता है। हाँ, किसी अपराध में अपराधी को यदि मौत की सजा ही देनी है तो समाज के बीच  में उसे पिंजड़ा में बंदकर भूखे-प्यासे तड़पा कर मौत की सजा दी जानी चाहिए और उसकी स्थिति को विभिन्न टी. वी. व रेडियो चैनलों पर प्रसारित किया जाना चाहिए ताकि उसे अन्य लोग भी देख सके और उसका असर ऐसा पड़े कि फिर कोई भी वैसा अपराध करने का दुस्साहस न करे। वैसे एक दृष्टी से मौत की सजा उचित नहीं है क्योंकि हम मानव हैं और मानव को सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी माना गया है। तो अपराधी को मौत की सजा देना हमारी / हम मानव की बुद्धिमत्ता नहीं है बल्कि हमारी बुद्धिमत्ता तो अपराधी में सुधार लाकर उसे स्वच्छ विचार वाला बना देने में है। और इस प्रकार मौत की सजा देने के स्थान पर उसे सार्वजानिक स्थान पर पिंजड़ा में बंदकर भूखे-प्यासे रखे दिया जाए व साथ-साथ उसे उचित सिक्षा देकर उसमें सुधार का प्रयास भी किया जाए व उसमें सुधार लाया जाए। और फिर स्वच्छ विचारधारा के साथ उसे भी जीने का मौका दिया जाए। हाँ, उसे लगातार एकदम ही भूखे भी न रखा जाना चाहिए बल्कि अपना उसे अपना अपराध महसूस करने व अपने में सुधार के लिए सोचने व ऐसा करने के लिए जिंदा रहने के लिए कुछ दिनों के अंतराल पर भोजन या जो उचित हो देकर उसे जिंदा रखा जाना चाहिए। और सजा के दौरान यदि यह प्रतित नहीं होता है कि उसमें सुधार हो गया है तो जीवन भर उसे उसी तरह से उसी सजा में रखा जाना चाहिए। सार्वजानिक रूप से सजा दिया जाए ताकि अन्य लोग उसे उस स्थिति में देखकर सबक ले और फिर कोई भी वैसा अपराध न करे। सजा के दौरान उस अपराधी की स्थिति का प्रसारण विभिन्न टी. वी. व रेडियो चैनलों पर भी होनी चाहिए ताकि उस सजा को अधिकाधिक लोग देखे और उसका असर व्यापक रूप से पड़े व सजा का यह उद्देश्य सफल हो कि फिर कोई ऐसी अपराध करने का दुस्साहस न करे।

हाँ, मैं यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं यहाँ भूखे रखने की सजा मौत / फाँसी की सजा के स्थान पर रखना उचित समझता हूँ पर किस अपराध में ऐसी सजा की व्यवस्था हो इसकी चर्चा मैं यहाँ नहीं कर रहा हूँ। मैं यह भी कहना चाहूँगा कि वर्तमान में जिस तरह से समाज से दूर फाँसी की सजा दी जाती है उससे अन्य अपराध प्रवृति के व्यक्ति पर विशेष असर नहीं पड़ता है क्योंकि उनकी मानसिकता अपराधिक प्रवृति की ही रहती है और उसके सामने सजा न होने पर उसकी मानसिकता में बदलाव नहीं आता है।

अब में आता हूँ बलात्कार पर सजा की बात पर। बलात्कारी की सजा क्या होनी चाहिए -- वास्तव में यह एक महत्तवपूर्ण प्रश्न है। वास्तव में बलात्कार या सामूहिक बलात्कार या यौन शोषण एक जघन्य अपराध है और इस अपराध के साथ अपराधी पशुता से भी नीचे गिर जाता है। इस अपराध के बाद अपराधी मानव कहलाने लायक नहीं रह जाता है। अतः निश्चित रूप से ऐसे अपराधी को कड़ी-से-कड़ी सजा मिलनी चाहिए तथा सजा ऐसी होनी चाहिए जिसका समाज पर व्यापक असर हो और फिर कोई भी ऐसी अपराध करने का विचार भी मन में न लाए। मेरे विचार से ऊपर मेरे द्वारा बताये गए भूखे रखने की सजा से भी कठोर सजा इस अपराध के लिए होना चाहिए। पर वह कठोर सजा क्या हो इसपर गंभीरता से सोचकर तय किया जाए। मैं यह भी कहना चाहूँगा कि वह कठोरतम सजा जो भी हो पर इस अपराध में पीड़िता के ईलाज में खर्च व पीड़िता को दी जाने वाली मुवावजा की रकम अपराधी से वसूल किया जाना चाहिए।

अंत में मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि सजा तो अपराध हो जाने के बाद दी जाती है। हमें वैसी व्यवस्था करनी चाहिए कि अपराध हो ही नहीं। और ऐसी व्यवस्था के लिए हरेक मामला पर उचित व्यवस्था, उचित प्रशासन तथा उचित व त्वरित कार्रवाई के साथ-साथ प्रारंभ से ही बच्चों को उचित शिक्षा दी जानी चाहिए ताकि आगे बढ़कर उसकी मानसिकता अपराधिक प्रवृति की न बने।

धन्यवाद।

आपका -
महेश

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